व्यवस्था के प्रति आक्र्रोश
आक्रोश की व्यवस्था
समान्तर रेखाएं
रेलपॉंत की तरह
मिलतीं नहीं ।
प्रयोगधर्मी व्यवस्था
उगाता रहता है
फैलाता रहता है
भीतर और बाहर
असन्तोष
कुन्ठा
आक्रोश
तद्जनित विद्रोह ।
वाद का इन्द्रजाल
जब भी विध्वंश की राह होता है
बसाना चाहता है अपना स्वर्ग
अवशेष पर
निर्जन में
एक नई व्यवस्था
फिर से
आक्रोश के लिये
अभिशप्त ।
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गुरुवार, 9 अप्रैल 2009
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आ० सुरेश जी,
जवाब देंहटाएंसुन्दर! बधाई!
देश की विडम्बना।
समय का दंश।
भ्रम और विध्वंश
आँधी सी आई है।
सादर
हिंदी ब्लॉग की दुनिया में आपका सादर स्वागत है....
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर…..आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्लाग जगत में स्वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।
जवाब देंहटाएंबहुत बढिया लिखा है आपने , इसी तरह उर्जा के साथ लिखते रहे ।
जवाब देंहटाएंबहुत धन्यवाद
मयूर
अपनी अपनी डगर